एलन मस्क का वो प्रोजेक्ट जो आपके दिमाग की आउटपुट क्षमता कर देगा सुपरकंप्यूटर जैसी–चूंकि यह निश्चित है कि भविष्य में आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस एक वैश्विक और विस्तृत रूप में उभरेगी और ऐसा होगा तो इनका कंट्रोल भी इंसानो के लिए बड़ी चुनौती होगा। क्योकि मशीन की तेजी से बढ़ती इंटेलिजेंस पर अगर एक मजबूत नियंत्रण ना हो तो यह इंसानो के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है, यही कारण है कि बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग शुरू से ही इसके विपक्ष में रहा है।

चूंकि अगर मशीने इंटेलिजेंस होगी, जोकि खुद सोच समझ कर फैसले लेगी ,तो ऐसे में उन्हें नियंत्रित करने का तरीका भी इंतेजेन्ट ही होना चाहिए और ऐसा ही एक तरीके पर काम कर रहे आयरन मैंन! अरे नही यार फिल्मी टोनी स्टार्क नही बल्कि रियल टोनी स्टार्क “एलन मस्क“।

अब एलन मस्क को आखिर रियल टोनी स्टार्क युही थोड़े कहा जाता है। तो एलन मस्क की एक कम्पनी और है Neuralink जिसका हेडक्वार्टर सेनफ्रांसिस्को, अमेरिका में है और इसे जुलाई 2016 में मस्क और टीम द्वारा स्थापित किया गया था। जैसा कि नाम से प्रतीत होता है,तो यह कम्पनी दिमाग से सम्बंधित मशीनी शोध और निर्माण का कार्य करती है । असल मे कंपनी को स्थापित करने का मकसद मुख्यत मस्तिष्क और कंप्यूटर इंटरफ़ेस तैयार करना है।

जहां कृत्रिम मस्तिष्क निर्माण से लेकर ,मस्तिष्क को कंप्यूटर से कनेक्ट करने की टेक्नोलॉजी लाने और मस्तिष्क को मशीनी तेजी से काम कराने वाले विचार पर कार्य कराने जैसी परियोजनाए शामिल है।

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हमारा दिमाग दुनिया के किसी भी सुपर कंप्यूटर से कही अधिक समझदार है और कही बेहतर निर्णय लेने की क्षमता रखता है।लेकिन फिर भी हम जब ही कुछ ऐसा कार्य जो कंप्यूटर को सिखाया गया है जैसे कैलक्यूलेशन एक कैलक्यूलेटर से भी तेजनहीँ कर पाते।

आखिर ऐसा क्यों है कि जिसने कैलक्यूलेटर बनाया वो ही कैलक्यूलेटर से ज्यादा समय कैलक्यूलेशन में ले रहा है? कारण है आउट पुट का समय ।

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असल मे हम जब कैलक्यूलेटर या कंप्यूटर में कोई गणना करते है तो वो अपना आउटपुट एक दम से देता है क्योंकि उसे ऐसे ही डिजाइन किया गया है।जबकि दिमाग के साथ ऐसा नही है दिमाग को किसी भी कैल्कुलेशन को कर तो सकता है पर उसका आउटपुट एक मशीन की तुलना में कम हो जाता है।

एक दूसरे उदाहरण पर अगर हम एक एआई मशीन को कुछ चीज दिखाए और उसके मशीनी दिमाग मे उसकी पहचान दर्ज कराए तो अगर वह मशीन उस वस्तु को देखती है तो उसका आउट पट इंसानी दिमाग से मामूली ही सही पर तेज ही होगा। वही इसके हल की बात करे तो न्यूरल लेस के रूप में इस पर पहले से ही काम चल रहा है।

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न्यूरल लेस मतलब वे इलेक्ट्रोड या पार्टिकल जिन्हें दिमाग में ऑपरेशन के माध्यम से डाल कर दिमाग की क्षमता को काफी तेज या यूं कहें मशीनी बनाया जा सकता है। परन्तु किसी भी मनुष्य में न्यूरोलेस को डालना महंगा और रिस्की और बड़ी बात बार-बार किये जाने वाला कार्य है,यही कारण है कि अब तक इसका प्रयोग मानसिक विक्लांगो पर ही किया जाता रहा है । परन्तु इस समस्या के लिए कंपनी ने जो हल निकाला है वो है न्यूरोलेस मिनिएचर चिप का प्रयोग।

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असल मे मिनिएचर चिप को गर्दन के माध्यम से शरीर मे जोड़ा जा सकता है जिससे बाद में खून के माध्यम से यह यह दिमाग मे चली जायेगी और फिर इसके माध्यम न्यूरॉन की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। चूंकि यह चिप इलेक्ट्रॉनिक है तो इसे इसे इस हिसाब से डिजाइन किया जा रहा है कि इसके माध्यम से बाहरी इलेक्ट्रॉनिक दुनिया को भी नियंत्रित किया जा सके ।

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तो हम कह सकते है न्यूरोलेस मिनिएचर चिप एक इंटेलिजेंस विकल्प हो सकता है तेजी से बढ़ती आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस पर नियंत्रण का। वही हम समझ चुके है कि इससे हमारा दिमाग की आउट पुट क्षमता काफी तेज हो जाएगी ।इसलिए यह टेक्नोलॉजी विक्लांगो के लिए भी वरदान होगी।

उदाहरण के तौर पर अगर एक ऐसे व्यक्ति जिसके पैर नही के कृत्रिम पैर लगा दिए जाए जो कि दिमाग में लगी मिनिएचर चिप से कनेक्ट होंगे तो सम्भव है कि वह बेहतर आउटपुट के साथ एक स्वस्थ टांगो वाले व्यक्ति को रेस में हरा दे।

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