न्द्रयान–2:शुरू हुआ काउंटडाउनइसरो के महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग का रिहर्सल सफल रहा है और इसका काउंटडाउन रविवार शाम 6:43 से शुरू हो गया। 15 जुलाई को लॉन्चिंग टाले जाने के बाद इसरो ने इसके लिए 22 जुलाई को दोपहर 2:43 बजे का वक्त तय किया था। गौरतलब है कि 15 जुलाई को चन्द्रयान 2 को ले जाने वाले जीएसएलवी मार्क III-एम 1 कार्योजनिक इंजन में लीकेज के कारण लांचिंग को कुछ समय के लिये स्थगित कर दिया था। वही इसरो प्रमुख के.सिवान ने इसके पूरी तरह सही होने और लांचिंग के लिए तैयार होने की पुष्टि कर दी है।इसरो चीफ के. सिवन ने बताया, “चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग से जुड़ी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। पहले प्रयास जो तकनीकी खामी आई थी, उसे भी दूर कर लिया गया है। आज शाम से इसकी लॉन्चिंग के लिए काउंटडाउन शुरू होगा।’ इसरो के पूर्व चीफ ए.एस किरण कुमार ने कहा कि इस तरह के किसी भी अभियान से पहले हम कई स्तरों पर टेस्टिंग करते हैं।पिछली बार हमें एक खामी मिली ती और इससे पार पा लिया गया है।

अब हम चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग के लिए तैयार हैं।”उन्होंने बताया कि चंद्रयान 22 जुलाई को लॉन्च होगा और 14 अगस्त से हम चंद्रमा के लिए यात्रा शुरू करेंगे। इसके बाद 6 सितंबर तक मून पर लैंडिंग होगी। सभी ऐक्टिविटीज अच्छे से चल रही हैं। इससे पहले शनिवार दोपहर को इसरो ने बताया कि चंद्रयान-2 को ले जाने वाले जीएसएलवी मार्क III-एम 1 की लॉन्च रिहर्सल पूरी हो गई है और परफॉर्मेंस नॉर्मल है।

धरती पर ही तैयार किया गया चन्द्रमा का कृत्रिम माहौल

इसरो की साख और देश के गर्व और अभिमान से जुड़े महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष अभियान चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) को सफल बनाने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान को सफलतापूर्वक चांद पर उतारने के लिए चंद्रमा का कृत्रिम माहौल धरती पर तैयार किया। वहां की जमीन का निर्माण किया गया। चांद की सतह पर रहने वाले प्रकाश की तरह की धरती पर व्यवस्था की गई।
दरअसल धरती की सतह से चांद की सतह एकदम अलग है। इसलिए चांद की सतह पर लैंडर और रोवर उतारने के लिए धरती पर कृत्रिम चांद की सतह का निर्माण जरूरी था। यूआर राव सेटेलाइट सेंटर (इसरो सेटेलाइट सेंटर) के निदेशक रहे एम अन्नादुरई बताते हैं कि चांद की सतह क्रेटर (बड़े-बड़े गढ्डे), चट्टानों और धूल से ढकी हुई है। इसकी मिट्टी की बनावट पृथ्वी से बिल्कुल अलग है। चूंकि उड़ान से पहले लैंडर के पैर और रोवर के पहियों का उस जमीन पर परीक्षण जरूरी था।इसके अलावा चंद्रमा पर सूर्य का प्रकाश जिस वेग से पड़ता है और उसकी प्रदीप्ति जितनी होती है, उसी अनुपात में परीक्षण स्थल पर रौशनी की व्यवस्था की गई।रोवर परीक्षण-शुरुआत में रोवर प्रज्ञान में चार पहिये लगे थे। लेकिन परीक्षण के बाद इसरो के वैज्ञानिकों ने इसे और अधिक स्थिरता देने के लिए इसमें छह पहिये लगाए। कुछ बदलाव पहियों के आकार के साथ भी किए गए। रोवर के भार को कम करने और धरती से कम होने वाले चांद के गुरुत्व बल से तारतम्य बैठाने के लिए उसके साथ हीलियम के गुब्बारे लगाए गए।

रोवर और लैंडर के बीच संचार क्षमताओं का परीक्षण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में किया गया।लैंडर परीक्षण-लैंडर विक्रम का परीक्षण करने के लिए, कर्नाटक में चित्रदुर्ग जिले के चल्लाकेरे में चांद के कृत्रिम क्रेटर बनाए गए। सॉफ्ट-लैंडिंग से पहले लैंडर विक्रम के सेंसर यह जांचेंगे कि क्या उतरने वाला भूभाग सुरक्षित है या नहीं। लैंडिंग के बाद भी अगर इलाक़ा उपयुक्त नहीं है तो लैंडर ऊपर जाकर एक स्थान पर स्थिर हो जाएगा।टीम ने एनआरएससी (नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर) से संबंधित छोटे प्लेन में सेंसर लगा दिए और सेंसर की जांच करने के लिए इसे दो बार कृत्रिम सतह के ऊपर उड़ाया। अन्य अंतरिक्ष एजेंसियां भी अपने उपकरणों की जांच के लिए ऐसे परीक्षण स्थलों का निर्माण करती हैं जिससे वास्तविक रूप से उतरने में लैंडर को कोई दिक्कत न आए। लैंडर के एक्युटेटर्स महेंद्रगिरि के इसरो सेंटर में जांचे गए। यहीं इसके थ्रस्टर्स की भी जांच की गई। लैंडर के पैर की दो परिस्थितियों में जांच की गई। एक उतरते समय इंजन बंद करके और दूसरा इंजन चालू रहते।

GSLV mark III 

जीएसएलवी मार्क III को जीसेट-19 के साथ पहली बार 5 जून 2017 को लांच किया गया था (सफल मिशन)।जिसके M1 नामित वर्जन के साथ चन्द्रयान-2 को 22 जुलाई 2019,सोमवार को लांच जाएगा। जीएसएलवी मार्क-3 जिसे भारतीय रॉकेट का बाहुबली भी कहा जाता है,आखिर क्यों देश के लिए इतना महत्वपूर्ण है ,आइए संक्षेप में जानते है।

1. जीएसएलवी मार्क 3 में देश में ही विकसित क्रायोजेनिक इंजन लगा है।

2. क्रायोजेनिक इंजन के अलावा इसके मोटर (एस200) में 2 ठोस पट्टियां हैं और यह कोर लिक्विड बूस्टर (एल110) से लैस है।

3. यह फुली लोडेड बोइंग जंबो जेट या 200 हाथियों जितना वजनदार है। जीएसएलवी मार्क-3 सबसे खास बात यह है कि सबसे वजनी रॉकेट को भारत की धरती से लांच किया गया था। इससे पहले हम 2,300 किलोग्राम से अधिक भार वाले रॉकेट को लांच करने के लिए विदेशों पर निर्भर थे।

4. जीएसएलवी मार्क-3 डी1 तीन चरणों वाला वीइकल है जो स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज इंजन से लैस है। इसका निर्माण जियोसिंक्रनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) तक सबसे वजनी संचार सैटलाइट ढोने के लिए किया गया है।

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